Detonator in Railway: भारतीय रेल नेटवर्क देश के कोने-कोने तक फैला हुआ है जिसपर ट्रेनों का परिचालन सिग्नल के जरिये किया जाता है| यानी कि लोको पायलट सिग्नल को देखकर ही ट्रेनों को चलाते हैं| सर्दियों के मौसम में भारत में कुछ ऐसी जगहें हैं जहाँ पर कोहरा इतना घना होता है की 10 मीटर आगे तक देख पाना लोको पायलट के लिए मुश्किल हो जाता है| ऐसे में सिग्नल को दूर से देख पाना और उन्हें समझना ट्रेन के ड्राइवर के लिए बहुत बड़ी समस्या होती है| इसी समस्या से बचने के लिए अंग्रेजों के जमाने से ही डेटोनेटर की शुरुआत की गई| आइये जानते हैं रेलवे में डेटोनेटर क्या होते हैं और इसका इस्तेमाल कैसे होता है:
रेलवे में डेटोनेटर क्या होता है
रेलवे में डेटोनेटर का मतलब होता है बारूद से भरा हुआ पटाखा जो की सिर्फ आवाज करने के काम में आता है| इसे रेलवे ट्रैक पर लगाया जाता है और जब कोई ट्रेन इसके ऊपर से गुजरती है तो जोरदार आवाज होती है, और लोको पायलट का ध्यान आकर्षित होता है और उसे खतरे का संकेत मिलता है| पटाखा सिग्नल का रंग लाल होता है जिसके ऊपर मैन्युफैक्चरिंग, डेट तथा मैन्युफैक्चरिंग वर्ष लिखा होता है| इसे प्लास्टिक के डिब्बे में रखा जाता है| डेटोनेटर उन सभी कर्मचारियों को दिए जाते हैं जो ट्रेन संचालन के साथ सीधे जुड़े होते हैं जैसे स्टेशन मास्टर, लोको पायलट, गेटमैन, पेट्रोलमेन, कीमैन आदि|
रेलवे में डेटोनेटर का इस्तेमाल कब और कैसे होता है (Detonator in Railway)
रेलवे की भाषा में डेटोनेटर को फॉग सिस्टम रेलवे अलार्म या पटाखा सिग्नल, कुहासा सिग्नल या फिर सिर्फ डेटोनेटर बोला जाता है| मुख्यत: दो परिस्थितियों में इनका उपयोग होता है: घने कुहासे के मौसम में तथा आपातकालीन स्थिति में अवरोध से बचाव के लिए| सर्दियों के मौसम में जब फॉग यानि कोहरा ज्यादा होता है तो किसी सिग्नल से पहले उचित दुरी पहले लोको पायलट को सिग्नल के बारे में बताने के लिए डेटोनेटर को ट्रैक पर लगा दिया जाता है|
कई बार आपातकालीन स्थिति में ट्रैक पर ट्रेन को आने से रोकने के लिए पर्याप्त दूरी पर डेटोनेटर लगाए जाते हैं| जब डेटोनेटर के ऊपर से ट्रेन का पहिया गुजरता है तो इसके दबाव से उसमें भरा बारूद फट जाता है और यह इतना तेजी से आवाज़ करता है जिससे लोको पायलट या समझ जाते हैं कि आगे सिग्नल है या कोई खतरा है और वो अपने स्पीड को कंट्रोल कर लेते है या स्लो कर लेते है|
भारतीय रेलवे में इस्तेमाल होने वाले डेटोनेटर को मैन्युफक्चरिंग डेट पांच साल तक इस्तेमाल किया जाता है| इसके बाद हर बैच में से दो डेटोनेटर को चेक किया जाता है, जिसके आधार पर डेटोनेटर को अधिकतम मैन्युफक्चरिंग के 08 साल तक इस्तेमाल करने की अनुमति होती है|
ट्रैक पर एक पटाखा कब लगाते हैं (One Detonator in Railway Track)
पटाखा सिग्नल का परीक्षण करते समय एक पटाखा पटरी पर रखकर उसके ऊपर एक खाली माल डिब्बा 8 से 11 किलोमीटर प्रतिघंटे की गति से चलाया जाता है| आपातकाल में बचाव करने के लिये जब नियमानुसार पटाखे लगाकर बचाव करना संभव न हो तो एक पटाखा अवरुद्ध से जितनी दूरी पर लगाना संभव हो सके, वहाँ लगाकर आपातकालीन बचाव किया जाता है|
ट्रैक पर दो पटाखा सिग्नल कब लगाते हैं (Two Detonator in Railway Track)
धुंध और कोहरे के मौसम में लोको पायलट को ये सूचित करने के लिए कि वो स्टेशन सिग्नलों के नजदीक पहुँच रहा है, बाहर के आखिरी सिग्नल से 270 मीटर की दूरी पर लगे फॉग सिग्नल पोस्ट के पास 10 मीटर के अंदर दो पटाखे लगाए जाते हैं|
सामग्री गाड़ी का बचाव करते समय, अवरोध से 600 मीटर की दूरी पर एक बैनर फ्लैग लगाया जाता है और उससे 10-10 मीटर की दूरी पर दो पटाखे लगाए जाते हैं| ऑटोमैटिक सेक्शन में किसी स्टेशन से बिना रोके जाने वाली गाड़ी को रोकने के लिए गाड़ी लाने की दिशा में सेक्शन प्लैटफॉर्म के सिरे से 180 मीटर की दूरी पर 10-10 मीटर के अंदर पर दो पटाखे रखे जाते हैं और साथ ही प्लैटफॉर्म से खतरा हाथ-सिग्नल द्वारा दिखाया जाता है|
0 Comments